सिंगरौली के धिरौली में भाजपा-अडानी नेक्सस का क्रूर चेहरा
मध्य प्रदेश की धरती हमेशा से आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की साक्षी रही है। लेकिन आज, सिंगरौली जिले के धिरौली कोयला ब्लॉक से जो तस्वीरें और खबरें आ रही हैं, वे किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल दहला देने वाली हैं। विकास के छद्म मुखौटे के पीछे छिपी मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार और उद्योगपति गौतम अडानी का गठजोड़ हमारे सीधे-साधे और गरीब आदिवासी परिवारों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से बेरहमी से बेदखल कर रहा है। यह सिर्फ जमीन का अधिग्रहण नहीं, यह एक पूरी संस्कृति, आजीविका और अस्मिता का खात्मा है। सिंगरौली के अमरई और बासी जैसे गांवों में पीढ़ियों से रह रहे हजारों आदिवासी परिवारों की जिंदगी आज एक अनिश्चित और डरावने मोड़ पर खड़ी है। इन आदिवासियों के लिए जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं है, बल्कि उनके जीवन की आत्मा है। उनकी आजीविका महुआ बीनने, तेंदूपत्ता इकट्ठा करने और वनोपजों पर ही निर्भर है। जब एक विशालकाय पेड़ कटता है, तो जमीन पर सिर्फ लकड़ियां ही नहीं गिरती, बल्कि एक आदिवासी परिवार के चूल्हे की आग बुझ जाती है। करीब 27 वर्ग किलोमीटर (लगभग 1400 हेक्टेयर) में फैले घने जंगलों को उजाड़ने की तैयारी है, जिसमें 6 लाख से अधिक हरे-भरे पेड़ों की बलि चढ़ा दी जाएगी। सोचिए, उन मासूम बच्चों और बुजुर्गों पर क्या गुजर रही होगी, जो अपने ही आंगन को, अपनी पूजनीय धरती को कंक्रीट के काले गर्त में समाते देख रहे हैं। बेदखली की यह पीड़ा शब्दों से परे है; यह उनके अस्तित्व को मिटाने की क्रूर साजिश है। यह बेहद शर्मनाक है कि खुद को 'आदिवासी हितैषी' बताने वाली मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार इस पूरे मामले में एक मूक दर्शक ही नहीं, बल्कि दमनकारी की भूमिका में है। सत्ता के अहंकार में चूर सरकार ने आदिवासियों को सुरक्षा देने वाले तमाम कानूनों को ताक पर रख दिया। गौतम अडानी के व्यावसायिक हितों के लिए भाजपा सरकार के राज में आदिवासियों के लिए बने नियमों और कानूनों का खुला मखौल उड़ाया जा रहा है। 'पेसा अधिनियम' को हाशिए पर रखकर ग्राम सभाओं की वास्तविक सहमति के बिना फैसले थोपे जा रहे हैं। 'वन अधिकार कानून' का उल्लंघन हो रहा है। आदिवासियों के पारंपरिक दावों को दरकिनार कर दिया गया। 'भूमि अधिग्रहण कानून' की अनदेखी हो रही है और बिना किसी उचित सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन और बिना न्यायसंगत पुनर्वास नीति के, पुलिसिया तंत्र और प्रशासनिक जोर-जबरदस्ती के दम पर आदिवासियों को डरा-धमका कर उनकी जमीनों से खदेड़ा जा रहा है। तकनीकी और कानूनी पेचीदगियों का सहारा लेकर, जनहित की आवाजों को दबाया जा रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से लेकर अन्य मंचों पर उठने वाली आपत्तियों को प्रक्रियात्मक देरी का बहाना बनाकर खारिज करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। आखिर यह सब किसके लिए किया जा रहा है? देश के पर्यावरण को दांव पर लगाकर, 6 लाख पेड़ों को काटकर और लाखों आदिवासियों को बेघर करके किस 'विकास' की गाथा लिखी जा रही है? जवाब साफ है यह सब उद्योगपति गौतम अडानी के आर्थिक हितों को संरक्षण देने के लिए हो रहा है। भाजपा सरकार ने देश और प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों को चुनिंदा उद्योगपतियों की जागीर बना दिया है। मध्य प्रदेश की जनता की कीमत पर अडानी समूह के मुनाफे की तिजोरी को भरने का यह खेल अब बर्दाश्त से बाहर है। सरकार जनता की चुनी हुई प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि कॉरपोरेट के 'एजेंट' के रूप में काम कर रही है। कांग्रेस पार्टी और मध्य प्रदेश का विपक्ष इस अन्याय पर चुप बैठने वाला नहीं है। हम सिंगरौली के अपने आदिवासी भाइयों और बहनों की इस मार्मिक लड़ाई में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। 'हम भाजपा सरकार और उनके पूंजीपति मित्रों को यह साफ चेतावनी देते हैं: आदिवासियों की आजीविका और उनके वजूद को कुचलकर पूंजीवाद के महल खड़े करने की अनुमति हम नहीं देंगे। जल, जंगल और जमीन पर पहला हक इस देश के मूल निवासियों का है, और हम सड़क से लेकर सदन तक इस हक की लड़ाई को और तेज करेंगे। अन्याय के खिलाफ यह जंग तब तक जारी रहेगी, जब तक हर एक आदिवासी परिवार को उसका हक, सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल जाती।'